पिता की परछाई
पिता वो छांव हैं जो धूप सह जाते हैं,
अपने बच्चों के सपने सजा जाते हैं।
सख्त बाहरी रूप में प्यार छिपा है,
हर कंधे का बोझ जो खुद उठा लेता है।
उसकी आंखों में उम्मीदों का उजाला है,
उसके हाथों में मेहनत का प्याला है।
हर कदम पर हमें संवारने का जुनून,
पिता ही हैं जीवन का सच्चा मूलधन।
सूरज की तरह तपता है वो हर दिन,
ताकि हमारे हिस्से में आए चांद की छवि।
अपनी हर खुशी को त्याग देता है,
पिता अपने बच्चों के लिए जीता है।
डांट में भी छुपा उसका अपनापन,
उसकी चुप्पी में छिपा होता है चिंतन।
बिना कहे वो सब कुछ सह लेता है,
हर दर्द को खुद में छिपा लेता है।
पिता, तू वो नींव है इस घर की,
तेरी ममता नहीं दिखती मगर सजीव है।
तेरे बलिदानों को शब्दों में नहीं बाँध सकते,
पिता, तू हमारा जीवन, हमारी पहचान है।
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